क्या सुरक्षा हादसे के बाद याद आती है?

किसी शहर में पढ़ने के लिए घर से निकलना जितना आसान तस्वीरों में लगता है, असल में उतना होता नहीं है। घर छोड़ते वक्त मां की वही हिदायतें होती हैं, पापा की वही चिंता और बच्चे का वही भरोसा—“मैं संभाल लूंगा।” दिल्ली आने वाले भी ऐसे ही आते हैं। कोई विश्वविद्यालय में दाखिले का सपना लेकर, कोई प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए और कोई बस इसलिए कि उसे लगता है कि शायद इस शहर में उसका भविष्य थोड़ा बेहतर होगा। फिर इसी शहर में कहीं एक पीजी मिलता है। कमरा छोटा हो सकता है, किराया ज्यादा हो सकता है, साथ रहने वाले लोग अनजान हो सकते हैं, लेकिन कुछ ही दिनों में वही कमरा अपना लगने लगता है। फिर एक दिन खबर आती है कि वही इमारत गिर गई।

दिल्ली के सत्य निकेतन में हुए पीजी हादसे की खबर पढ़कर शायद हमारे लिए यह कुछ मिनटों की खबर हो। हम पढ़ेंगे, दुख जताएंगे, आगे बढ़ जाएंगे। लेकिन जिन घरों से बच्चे उस पीजी में रहने आए थे, उनके लिए यह कोई खबर नहीं है। उनके लिए यह वह दिन है, जिसका डर शायद अब हमेशा उनके साथ रहेगा। और यहीं से बात सिर्फ एक इमारत के गिरने की नहीं रह जाती। बात यह है कि जो बच्चे अपने घर से दूर रह रहे हैं, उनकी सुरक्षा आखिर किस भरोसे पर टिकी है?

पीजी ढूंढते समय हम अक्सर पूछते हैं—किराया कितना है? कॉलेज कितनी दूर है? खाना कैसा मिलेगा? कमरा सिंगल है या शेयरिंग? लेकिन शायद ही कभी कोई पूछता है कि इमारत कितनी सुरक्षित है, उसकी जांच कब हुई थी या उसमें चल रहा कोई निर्माण कार्य रहने वाले लोगों के लिए खतरा तो नहीं है। और शायद ऐसा इसलिए भी है क्योंकि एक छात्र से यह उम्मीद करना ही गलत है कि वह कमरे की दीवार देखकर उसकी मजबूती का अंदाजा लगा ले। सुरक्षित जगह देना किसी सुविधा की तरह नहीं, एक जिम्मेदारी की तरह देखा जाना चाहिए। खासकर तब, जब उस जगह में रहने वाले बच्चे अपने परिवार से दूर हों और उनके माता-पिता यह मानकर निश्चिंत हों कि उनका बच्चा एक सुरक्षित छत के नीचे है।

हर हादसे के बाद जांच बैठती है। फिर पता लगाया जाता है कि गलती कहां हुई, किसकी लापरवाही थी और किसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। यह सब जरूरी है। लेकिन शायद उससे भी जरूरी यह है कि हादसा होने से पहले ही किसी संभावित खतरे को पहचानने की कोशिश की जाए।

सत्य निकेतन की जिस इमारत में हादसा हुआ, वह छात्रों के रहने के लिए इस्तेमाल होने वाला एक निजी पीजी था। रिपोर्टों के मुताबिक, वहां मरम्मत या निर्माण से जुड़ा काम चल रहा था। दिल्ली पुलिस ने मामले में कथित मालिक और अन्य लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है और दिल्ली सरकार ने मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए हैं। पुलिस के अनुसार, हादसे में पांच लोगों की मौत हुई है और कई लोगों को बचाया गया है। हालांकि इमारत आखिर किस वजह से गिरी और इसके लिए किसकी जिम्मेदारी बनती है, यह जांच के बाद ही स्पष्ट होगा। लेकिन जांच का इंतजार करते हुए एक सवाल जरूर पूछा जा सकता है—क्या ऐसी जगहों की सुरक्षा को लेकर जांच और निगरानी पहले से नहीं होनी चाहिए? सत्य निकेतन और उसके आसपास का इलाका दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस में पढ़ने वाले छात्रों के बीच पीजी और छात्र आवासों के लिए जाना जाता है। हादसे के बाद वहां रहने वाले दूसरे छात्रों के बीच भी चिंता देखने को मिली और कुछ छात्रों को अस्थायी रहने की व्यवस्था की जरूरत पड़ी। ऐसे में किसी एक इमारत की सुरक्षा सिर्फ वहां रहने वाले छात्र की चिंता नहीं रह जाती। यह उन परिवारों की भी चिंता है, जो अपने बच्चों को दूसरे शहर भेजकर यह मानते हैं कि वे ठीक जगह पर रह रहे हैं।

हादसे के बाद छात्र संगठनों की ओर से दिल्ली के पीजी और छात्र आवासों के सुरक्षा ऑडिट की मांग भी उठी है। यह मांग सिर्फ इस एक घटना तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। अगर बड़ी संख्या में छात्र निजी पीजी और किराये के कमरों में रहते हैं, तो वहां सुरक्षा से जुड़े नियमों और उनकी नियमित जांच को लेकर एक साफ व्यवस्था होना जरूरी है। क्योंकि किसी छात्र को पीजी लेते समय यह नहीं सोचना चाहिए कि वह कम किराए के बदले अपनी सुरक्षा से समझौता कर रहा है। उसे यह भी नहीं पता होता कि जिस कमरे की चाबी उसे दी गई है, उस कमरे या पूरी इमारत की पिछली बार जांच कब हुई थी। उसे यह भी मालूम नहीं होता कि किसी निर्माण या मरम्मत के काम का उस इमारत पर क्या असर पड़ रहा है। और सच कहें तो यह सब पता करना उसकी जिम्मेदारी होनी भी नहीं चाहिए। उसकी जिम्मेदारी पढ़ना है। अपना भविष्य बनाना है। घर फोन करके कहना है कि “हां, मैं ठीक हूं।”

उसके माता-पिता भी यही सोचकर उसे दिल्ली भेजते हैं कि बच्चा उनसे दूर है, लेकिन ठीक है। वे रोज उसके साथ नहीं होते। उसके कमरे का दरवाजा नहीं देख सकते। इमारत की हालत नहीं देख सकते। उन्हें बस फोन पर उसकी आवाज सुनाई देती है और उसी से तसल्ली होती है। इसलिए जब ऐसी कोई खबर आती है, तो शायद सबसे ज्यादा डर उन लोगों को लगता है जिनका बच्चा किसी दूसरे शहर में पढ़ रहा है। वे उस दिन अपने बच्चे को फोन करते होंगे। शायद पहली घंटी पर फोन न उठा हो। फिर दूसरी बार किया होगा। फिर तीसरी बार। उन कुछ मिनटों में एक मां-बाप के मन में क्या गुजरती है, इसे खबर की कुछ पंक्तियों में शायद कभी नहीं लिखा जा सकता। हमें शायद इसी जगह रुककर सोचना चाहिए। हर बार हादसे के बाद यह पता लगाने से ज्यादा जरूरी है कि हादसा होने से पहले क्या देखा जा सकता था। कौन-सी इमारतें जांच के इंतजार में हैं। कहां नियमों के पालन को लेकर सवाल हैं। किन जगहों पर छात्र बिना पूरी जानकारी के रह रहे हैं। क्योंकि कार्रवाई तब होना सबसे आसान होता है, जब नुकसान हो चुका होता है। मुश्किल काम उससे पहले जागना है। कुछ दिनों बाद रास्ता फिर खुल जाएगा। खबरें भी नई खबरों के नीचे दब जाएंगी। लेकिन जिन घरों में उस दिन अपने बच्चे की खबर का इंतजार था, वहां शायद यह बात इतनी जल्दी खत्म नहीं होगी।

इसलिए बात सिर्फ इस एक इमारत की नहीं है। बात उन तमाम बच्चों की है, जो अपने घरों से दूर किसी पीजी में रहकर पढ़ रहे हैं, अपने लिए कुछ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उनके घरवाले वहां मौजूद नहीं होते, लेकिन उनका भरोसा हर दिन उनके साथ रहता है। शायद अब जरूरत इस बात की है कि किसी हादसे के बाद सिर्फ यह न पूछा जाए कि गलती किसकी थी। उससे पहले यह भी देखा जाए कि ऐसी स्थिति आने की गुंजाइश कहां-कहां है। क्योंकि घर से दूर रहने वाले बच्चे अपने साथ बहुत कुछ लेकर चलते हैं।उनके बैग में किताबें होती हैं, कुछ कपड़े होते हैं और घर से आते वक्त मां की वही बात—अपना ख्याल रखना।

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