हर दौर की अपनी-अपनी चोरी होती है। कभी किसी की ज़मीन छीन ली जाती थी। कभी किसी का हक़। कभी किसी के सपने। समय बदला… तरीके भी बदल गए। अब कुछ छीनने के लिए हमेशा हाथों की ज़रूरत नहीं पड़ती। कभी-कभी…बस एक मोबाइल ही काफ़ी होता है।
पहली बार यह बात पढ़ने में शायद अजीब लगे। लेकिन पिछले कुछ दिनों में सोशल मीडिया पर एक वीडियो बार-बार सामने आ रहा था। एक मोबाइल एप्लिकेशन की मदद से चलते हुए ई-रिक्शा को अचानक रोक दिया जाता था। किसी ने उसे तकनीक का कमाल कहा, किसी ने मज़ाक समझा, किसी ने वीडियो बनाकर आगे भेज दिया। फिर सरकार ने उस ऐप पर रोक लगा दी। मामला वहीं ख़त्म हो गया। लेकिन पता नहीं क्यों, मेरे लिए वह कहानी वहीं से शुरू हुई।
मैं उस वीडियो को देखकर आगे नहीं बढ़ पाई। इसलिए नहीं कि उसमें कोई नई तकनीक दिखाई गई थी, बल्कि इसलिए क्योंकि उसमें सबसे ज़रूरी चीज़ दिखाई ही नहीं दी। कैमरे में एक रुकता हुआ ई-रिक्शा था, लेकिन उसके साथ रुकती हुई चिंता नहीं थी। कैमरे में सड़क थी, लेकिन उस सड़क पर खड़े इंसान के मन में चल रही उथल-पुथल नहीं थी। वीडियो में कुछ सेकंड थे, लेकिन उन कुछ सेकंडों का असर शायद पूरे दिन तक साथ रहने वाला था।
मैं बार-बार सोच रही थी कि उस पल उसके मन में सबसे पहला ख़याल क्या आया होगा। उसने शायद जल्दी-जल्दी गाड़ी दोबारा स्टार्ट करने की कोशिश की होगी। फिर उतरकर देखा होगा कि कहीं कोई तार तो नहीं निकल गया, बैटरी तो ठीक है, कुछ टूट तो नहीं गया। उसे कहाँ पता था कि उसकी गाड़ी में कोई ख़राबी नहीं आई थी। किसी और के हाथ में पकड़े मोबाइल ने उसकी मेहनत को कुछ सेकंड के खेल में बदल दिया था। सोचकर ही अजीब लगता है… एक इंसान पूरे दिन की कमाई के लिए सड़क पर था और दूसरा उसी कमाई को कुछ सेकंड की हँसी में बदल रहा था।
हम अक्सर ई-रिक्शा को सिर्फ़ एक गाड़ी की तरह देखते हैं। लेकिन जिन लोगों के लिए वही घर चलाने का सहारा है, उनके लिए वह सिर्फ़ चार पहियों पर चलने वाली मशीन नहीं होती। वही सुबह घर से निकलने की वजह होती है और शाम को लौटने की उम्मीद भी। कोई धूप, धूल और ट्रैफिक में घंटों इसलिए नहीं रहता क्योंकि उसे अच्छा लगता है। वह इसलिए रहता है क्योंकि घर में किसी को दवा चाहिए, किसी बच्चे की फीस भरनी है, महीने का राशन ख़त्म होने वाला है या फिर सिर्फ़ इसलिए कि रात को चूल्हा जल सके।
हममें से ज़्यादातर लोग महीने के आख़िर में अपनी कमाई का इंतज़ार करते हैं। लेकिन बहुत से लोग ऐसे हैं जिनकी ज़िंदगी हर शाम तय होती है। अगर आज काम नहीं हुआ, तो आज की कमाई नहीं होगी। अगर आज की कमाई नहीं हुई, तो घर का पूरा हिसाब बिगड़ जाएगा। इसलिए उनके लिए एक दिन का नुकसान सिर्फ़ चौबीस घंटे नहीं होता। वह सीधे घर तक पहुँचता है। रसोई तक पहुँचता है। बच्चों की ज़रूरतों तक पहुँचता है। शायद इसी वजह से मुझे उस वीडियो में रुका हुआ ई-रिक्शा नहीं दिखा… मुझे एक पूरा घर दिखाई दिया, जो उस एक इंसान की मेहनत के भरोसे चल रहा था।
सबसे ज़्यादा तकलीफ़ मुझे इस बात से हुई कि बहुत से लोग उस वीडियो को देखकर हँस रहे थे। शायद इसलिए क्योंकि दर्द जब स्क्रीन के उस पार होता है, तो वह पूरा महसूस नहीं होता। हमें सिर्फ़ एक वीडियो दिखाई देता है, उसके पीछे की ज़िंदगी नहीं। हम कुछ सेकंड देखते हैं, लेकिन उन कुछ सेकंडों के बाद किसी इंसान पर क्या बीतती है, यह सोचने के लिए शायद हम रुकते ही नहीं। धीरे-धीरे हम वीडियो देखने लगे हैं, इंसान नहीं।
उस वीडियो के नीचे हज़ारों कमेंट थे। कोई हँस रहा था। कोई लिख रहा था, “वाह, क्या कमाल की तकनीक है।” कोई उस ऐप का नाम पूछ रहा था। मैं बहुत देर तक उन कमेंट्स को पढ़ती रही। पता नहीं क्यों, मैं एक ही बात ढूँढ़ रही थी। क्या किसी ने यह भी पूछा कि उस ई-रिक्शा वाले का क्या हुआ होगा? क्या वह अपनी मंज़िल तक पहुँच पाया? क्या उसकी गाड़ी फिर से चल पाई? क्या उसकी उस दिन की कमाई पूरी हो सकी? लेकिन ऐसे सवाल बहुत कम दिखाई दिए। शायद इसलिए क्योंकि किसी की परेशानी से ज़्यादा लोगों की दिलचस्पी उस परेशानी के वीडियो में थी।
मैं बार-बार यही सोचती रही कि अगर उस दिन वह आदमी घर थोड़ा देर से पहुँचा होगा, तो घरवालों ने क्या पूछा होगा? शायद किसी बच्चे ने दरवाज़ा खोलते ही कहा होगा, “आज इतनी देर कैसे हो गई?” शायद उसने मुस्कुराकर बात टाल दी होगी। शायद उसने यह भी नहीं बताया होगा कि उसके साथ क्या हुआ। क्योंकि जो लोग रोज़ अपनी मेहनत से घर चलाते हैं, वे अक्सर अपनी परेशानियाँ घर की चौखट के बाहर ही छोड़ आने की कोशिश करते हैं। उन्हें पता होता है कि घर में पहले ही बहुत चिंताएँ हैं, उनमें अपनी एक और चिंता जोड़ देने से कुछ बदलने वाला नहीं।
मुझे यह भी लगा कि शायद उस दिन उसने किसी मैकेनिक को बुलाया होगा। गाड़ी दिखवाई होगी। समय भी गया होगा, पैसे भी गए होंगे। बाद में अगर उसे पता चला होगा कि गाड़ी में कोई ख़राबी थी ही नहीं, तो उस पल उसे कैसा लगा होगा? कभी-कभी नुकसान सिर्फ़ पैसों का नहीं होता। कभी-कभी यह एहसास ज़्यादा तकलीफ़ देता है कि किसी ने बिना वजह आपकी मेहनत के साथ खेल किया।
हम अक्सर कहते हैं कि दुनिया बहुत आगे बढ़ गई है। सच भी है। आज मोबाइल से बैंक का काम हो जाता है, इलाज की सलाह मिल जाती है, दूर बैठे अपने लोगों से बात हो जाती है। तकनीक ने हमारी ज़िंदगी आसान बनाई है। लेकिन उसी तकनीक का इस्तेमाल अगर किसी ऐसे इंसान की मुश्किल बढ़ाने में होने लगे जो सुबह सिर्फ़ इसलिए घर से निकला था ताकि शाम तक अपने परिवार के लिए कुछ कमा सके, तो फिर हमें तकनीक पर गर्व करने से पहले उसके इस्तेमाल पर सोचना होगा।
अच्छी बात यह है कि अब सरकार ने उस ऐप पर रोक लगा दी है। ऐसा होना ज़रूरी था। लेकिन उस ख़बर के बाद भी मेरे मन में एक बात रह गई। ऐप बंद हो गया, लेकिन क्या उस सोच पर भी रोक लगी, जो किसी अनजान इंसान की परेशानी देखकर हँस देती है? क्योंकि कल कोई दूसरा ऐप आ जाएगा, कोई दूसरा तरीका भी मिल जाएगा। अगर कुछ नहीं बदला, तो वही हँसी फिर किसी और की मुश्किल पर सुनाई देगी।
शायद इसलिए मुझे उस वीडियो का सबसे दुखद हिस्सा ई-रिक्शा का रुकना नहीं लगा। सबसे दुखद बात यह लगी कि उसे रुकते देखकर बहुत से लोग हँस रहे थे। और जब किसी की रोज़ की मेहनत, किसी के घर का सहारा, किसी के पूरे दिन की कमाई हमें सिर्फ़ कुछ सेकंड का मनोरंजन लगने लगे… तो डर किसी ऐप से नहीं लगता। डर इस बात से लगता है कि कहीं हम धीरे-धीरे दूसरों का दर्द महसूस करना तो नहीं भूल रहे। सरकार ने उस ऐप पर रोक लगा दी। लेकिन उस दिन जो बात मेरे मन में आई थी… वह आज भी नहीं बदली। कैमरे ने सिर्फ़ एक ई-रिक्शा रुकते हुए दिखाया था… शायद इसलिए किसी ने यह देखा ही नहीं कि उसके साथ किसी का दिन भी रुक गया था।